क्या वीरता, मूल्यों और आदर्शों के चित्तौड़ को हर बार राघव चेतन और ख़िलजी छलते रहेंगे ?

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क्या वीरता, मूल्यों और आदर्शों के चित्तौड़ को हर बार राघव चेतन और ख़िलजी छलते रहेंगे…..?

जायसी और भंसाली दोनों का पद्मावत हमारे सामने है-प्रासंगिक है। चित्तौड़ और दिल्ली की तुलना में दोनों ही गाथाओं की संवेदना चित्तौड़ के ह्रदय के अधिक करीब है। जायसी ने केवल साहित्य रचा। मसनवी शैली में लिखा गया प्रेम और शौर्य की ही अभिव्यक्ति है।
शौर्य गाथा चित्तौड़ किले के द्वार पर राजा रत्न सेन और दिल्ली के शहंशाह ख़िलजी की लड़ाई ; दो सत्ताधारियों के बीच परस्पर युद्ध मे जब ख़िलजी मृत्यु के द्वार पर था तभी रत्न सेन की छल से हत्या करता है। वीर रत्न सेन ने ख़िलजी से कहा कि कम से कम तुम इस युद्ध में तो उसूलों का पालन करते ; पर ख़िलजी ने कहा सिर्फ जीत ही ध्येय है मेरा, मेरे लिए युद्ध में धोखा और फ़रेब सब जायज़ है । उस दिन रत्न सेन मरकर भी शौर्य गाथा का नायक बनता है। आज भी रत्न सेन को ही मरना पड़ता है।

पद्मावत का शौर्य मुख्यतः मेवाड़ के अदम्य वीर गोरा और बादल का है और शौर्य सिंहल कन्या मेवाड़ की रानी पद्मिनी का है।

दूसरी ओर ख़िलजी और राघव चेतन धोखा, अधर्म, अन्याय और क्रूरता के प्रतीक थे।

पद्मिनी का सौंदर्य सिंहल द्वीप की संवेदना थी, जो चित्तौड़ का आन बान और शान बनी और अन्ततः जो ख़िलजी की दिल्ली के लिए नश्वर प्रकृति में विलीन अपराजेय राख और मिट्टी बनकर रह गई।

रानी पद्मिनी का जौहर उस जमाने की सती प्रथा जैसा नहीं था। जिस चित्तौड़ के तीस हजार पुरुषों और बच्चों ने किले की रक्षा में अपना बलिदान दिया और उसी बलिदान को चर्मोत्कर्ष तक पहुंचाया पद्मिनी और महल की महिलाओं के जौहर ने। भारत का इतिहास उन महिलाओं के मान और सम्मान को आज भी नमन करता है। रानी पद्मिनी और उनकी वीरता आगे आने वाले वर्षों में भी विश्व चेतना को गौरव के साथ आंदोलित करेगी ।

पर, आज भी राघव चेतन घाव दे रहा है — ख़िलजी की प्रतिनैतिकता आज भी प्रासंगिक है– आगे आने वाले वर्षों में भी राघव चेतन, ख़िलजी जैसी प्रास्थितियां भारत की नींव पर प्रहार करती रहेंगी। ख़िलजी सा छल विद्यमान होगा। कल भी पद्मिनी, गोरा, बादल, रत्न सेन ने ही बलिदान दिया था— आज भी इनका ही अंत प्रासंगिक है —- आगे भी इनका अंत ही नियति रहेगी पर, इनके शौर्य और यश की गाथा गूंजती रहेगी। सत्य इनके साथ रहेगा।

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ajaynathjha

साधक है समता के सत्य न्याय करूणा के ! हिन्द प्रेम सम्बल है, विश्व प्रेम साध्य बना ।।

One thought on “क्या वीरता, मूल्यों और आदर्शों के चित्तौड़ को हर बार राघव चेतन और ख़िलजी छलते रहेंगे ?”

  1. गोरा ओर बादल के भूमिका को भंसाली ने नही समझा । अगर समझ जाते तो एक अच्छी फिल्म देखने को मिलती । ……. शानदार प्रस्तुति

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