मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती हैं….
4 मार्च को रेणु जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन –
तीसरी कसम की आखिरी पंक्तियां पढिये….
उसने उलट कर देखा, बोरे भी नहीं, बाँस भी नहीं, बाघ भी नहीं -परी ..देवी ..मीता .हीरादेवी ..महुआ घटवारिन -को-ई नहीं। मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती है। हिरामन के होंठ हिल रहे हैं। शायद वह तीसरी कसम खा रहा है -कंपनी की औरत की लदनी..

मैला आंचल के लेखक फणीश्वर नाथ रेणु को याद करना प्रासंगिक है.1947 में आजाद हुए भारत के क्रूर यथार्थ का चित्रण “मैला आंचल” –ग्रामीण भारत के यथार्थ का दस्तावेज है। 1936 में प्रेमचंद के गोदान में जहां आदर्श टूट रहे थे वही 1954 में मैला आँचल में भारत के घाव को उसी तरह रख दिया गया है.
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