है भीड़ इतनी पर दिल अकेला

है भीड़ इतनी पर दिल अकेला…

कुछ ऐसे जीवन होते हैं जो समय के शुष्क शिला पर अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते हैं। नीरज ऐसे ही गीतकार थे। उनके गीतों को याद करना एक सुखद अनुभव है… कहता है जोकर सारा ज़माना/ आधी हक़ीक़त आधा फ़साना

इस चुटीले अन्दाज़ में दर्द को बयां करना गोपाल दास नीरज ही जानते थे। अपना देश और इसकी आबोहावा के वे क़ायल थे कहाँ रे हिमालय ऐसा, कहाँ ऐसा पानी/ यही वो ज़मीं जिसकी दुनिया दीवानी/ सुंदर ना ऐसी कोई जैसी धरती हमारी

भारत एक है इसकी एक ही ख़ुशबू है…. फूल हम हज़ारों लेकिन, ख़ुशबू एक हमारी।

ऐसे लोग बार बार नहीं जन्म लेते।

फिर से जी उठा है जीवन

बरसात के हारे हुए बादलों सी सांझ रात
दूर पहाड़ी मंदिर की रोशनी
दूसरी ओर टैगोर हिल का वीरान सा मंडप
अमावस से पहले की स्याह रात।।
मैं वक़्त की ओर वक़्त मेरी ओर तक रहा।
दोनों ही बीत रहे…
बेबसी हम दोनों की है..
देखना सत्य को…
जूझते और हारते हुए।।

वक़्त ने कहा..
जो था कभी वो अब नहीं;
जो आज है वो कल नहीं.
मैं निरंतर बह रहा..
बह रहे तुम भी मेरे प्रवाह में..
बिन पतवार की नाव पर हो सवार।

आज तमस का वैराट्य है लीलने को
तभी स्याह आसमां के पश्चिमी क्षितिज पर
उम्मीद की रौशनी लिए
जुगनुओं की आहट..
फिर से जी उठा है जीवन
©ajaynathjha

कौन है जो मुझमें होकर भी मेरा नहीं है.. मेरे अंधेरों को लीलता हुआ दिये की लौ सा है.


कौन है जिसे हम आईने में नहीं अपने आप में ढूंढते हैं. अपने ही अक्स में घुल मिल सा गया है. वह मैं नहीं हूँ
, पर वह कोई और भी नहीं है. वह मेरे ही स्पन्दन से शब्द और आकार लेता है. सागर सा विस्तार है पर वह ओस की बूंद में भी समाया हुआ है.