कौन है जिसे हम आईने में नहीं अपने आप में ढूंढते हैं. अपने ही अक्स में घुल मिल सा गया है. वह मैं नहीं हूँ, पर वह कोई और भी नहीं है. वह मेरे ही स्पन्दन से शब्द और आकार लेता है. सागर सा विस्तार है पर वह ओस की बूंद में भी समाया हुआ है.

कौन है जिसे हम आईने में नहीं अपने आप में ढूंढते हैं. अपने ही अक्स में घुल मिल सा गया है. वह मैं नहीं हूँ, पर वह कोई और भी नहीं है. वह मेरे ही स्पन्दन से शब्द और आकार लेता है. सागर सा विस्तार है पर वह ओस की बूंद में भी समाया हुआ है.

Bhut bdiya
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धन्यवाद
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Good shab
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धन्यवाद
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बहुत खूब, प्रश्नात्मक शैली 👌
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धन्यवाद गिरिजा जी
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