कौन है जो मुझमें होकर भी मेरा नहीं है.. मेरे अंधेरों को लीलता हुआ दिये की लौ सा है.


कौन है जिसे हम आईने में नहीं अपने आप में ढूंढते हैं. अपने ही अक्स में घुल मिल सा गया है. वह मैं नहीं हूँ
, पर वह कोई और भी नहीं है. वह मेरे ही स्पन्दन से शब्द और आकार लेता है. सागर सा विस्तार है पर वह ओस की बूंद में भी समाया हुआ है.

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ajaynathjha

साधक है समता के सत्य न्याय करूणा के ! हिन्द प्रेम सम्बल है, विश्व प्रेम साध्य बना ।।

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