फिर से जी उठा है जीवन

बरसात के हारे हुए बादलों सी सांझ रात
दूर पहाड़ी मंदिर की रोशनी
दूसरी ओर टैगोर हिल का वीरान सा मंडप
अमावस से पहले की स्याह रात।।
मैं वक़्त की ओर वक़्त मेरी ओर तक रहा।
दोनों ही बीत रहे…
बेबसी हम दोनों की है..
देखना सत्य को…
जूझते और हारते हुए।।

वक़्त ने कहा..
जो था कभी वो अब नहीं;
जो आज है वो कल नहीं.
मैं निरंतर बह रहा..
बह रहे तुम भी मेरे प्रवाह में..
बिन पतवार की नाव पर हो सवार।

आज तमस का वैराट्य है लीलने को
तभी स्याह आसमां के पश्चिमी क्षितिज पर
उम्मीद की रौशनी लिए
जुगनुओं की आहट..
फिर से जी उठा है जीवन
©ajaynathjha

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ajaynathjha

साधक है समता के सत्य न्याय करूणा के ! हिन्द प्रेम सम्बल है, विश्व प्रेम साध्य बना ।।

6 thoughts on “फिर से जी उठा है जीवन”

  1. बहुत ही सुंदर …. आपको लिखते रहना चाहिए कुछ लोग इंतजार करते है ।

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