बरसात के हारे हुए बादलों सी सांझ रात
दूर पहाड़ी मंदिर की रोशनी
दूसरी ओर टैगोर हिल का वीरान सा मंडप
अमावस से पहले की स्याह रात।।
मैं वक़्त की ओर वक़्त मेरी ओर तक रहा।
दोनों ही बीत रहे…
बेबसी हम दोनों की है..
देखना सत्य को…
जूझते और हारते हुए।।
वक़्त ने कहा..
जो था कभी वो अब नहीं;
जो आज है वो कल नहीं.
मैं निरंतर बह रहा..
बह रहे तुम भी मेरे प्रवाह में..
बिन पतवार की नाव पर हो सवार।
आज तमस का वैराट्य है लीलने को
तभी स्याह आसमां के पश्चिमी क्षितिज पर
उम्मीद की रौशनी लिए
जुगनुओं की आहट..
फिर से जी उठा है जीवन
©ajaynathjha

बहुत ही सुंदर …. आपको लिखते रहना चाहिए कुछ लोग इंतजार करते है ।
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धन्यवाद बंटी
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बहुत ही खूबसूरत कविता।👌👌
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बहुत धन्यवाद !!
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Amazingly penned sir..I have no words to appreciate it…👍👍
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Thank you so much for sharing your valuable comments. Sorry for the late response.
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