
जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है…
शाम हो रही है….सूरज बस ढलने को ही है। कल सुबह आसमान में सूरज तो फिर से अपनी रोशनी से अन्धकार को हर लेगा…लोग उम्मीद से दिन की शुरूआत करेंगे।
एक और शाम दस्तक दे रही है अन्धेरा पसर रहा है… पर यह अनन्त तक फैला हुआ है। कोई सूरज उम्मीद का उजाला नहीं परोसेगा। इसे काल का तम भी नहीं कह सकते हैं … यह मृत्यु का पार्थिव यथार्थ नहीं है।
यह शाम कुछ और ही है …. यह सांझ मन के टूटने और हारने से उपजती है। यह प्रेम की संवेदना पर लौकिकता का अन्धेरा है। जब मन टूटता है तब जिजीविषा की शाम दस्तक दे जाती है। …. और तब जो अन्धेरा पसरता है वह अनन्त और विराट है। व्यथा का सागर ही सच है जिसमें समस्त सुख की नदियां विलीन हो जाती हैं …. इस घोर निबिड़ तम में सृजन के लिये उपजती व्यथा कथा … जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है।
You must be logged in to post a comment.