सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..
तीन दिनों तक उत्तर कोयल के किनारों पर
औरंगा के बयारों में
चियांकी के मैदान पर
सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..
देश के प्रधान ने आना था वहां
लाखों के आहट की प्रतीक्षा थी
उम्मीदों की बाट जोहते पलामू में
सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..
जनवरी में धूप की ऐसी जलन?
और कांपती सर्द रात की हवाओं में
तसल्ली की रेत भरी हथेली पर..
सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे.
समस्त कोलाहल में
दौड़ते भागते ऊबते पलों में
पहाड़ों घने जंगलों के बीच
सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे.
अंधेरी सड़कों पर
भागती गाड़ियों के बीच
दायित्वों के बाढ़ में
सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे
“तुम” मेरा ही एकान्त… मेरा ही अक़्स


बहुत खूब सर 👌👏
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बहुत धन्यवाद !!
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