
आ अब लौट चलें…अभी भी बहुत दूर नहीं भटके हैं हम
निस्तब्ध स्याह आकाश में चाँद को अपलक देख रहा हूँ..
क्या संयोग है..जो किसी ने नहीं सोचा था और जिसकी न ही किसी ने कल्पना की थी, वह अचानक सामने आ गया. सम्पूर्ण संसार को एक वायरस ने अपने आगोश में ले लिया. क्रूर समय है ..सड़कें खामोश और वीरान हैं …लोग डरे हुए हैं …मातम का तमस आसमान से धरती पर उतर रहा है.
कोरोना नाम है इस वायरस का. कैसा संयोग है..संसार के सभी धर्मों की मूल संवेदना का नाम भी करुणा ही है. 24/25 मार्च की आधी रात से भारत में लॉकडाउन शुरू हो गया. 28 मार्च को लॉक डाउन शुरू होने पर मेरे अनुज (संजय नाथ झा) ने फेसबुक पर बहुत मार्मिक ढंग ने कोरोना बनाम करुणा नाम से पोस्ट किया था. यह हम सबसे कुछ सवाल करती है. इसे जरूर पढ़ना चाहिए.
लिंक – https://bit.ly/2ybJxnc
प्रकृति से लंबे समय तक हमसब ने छल किया है. कोरोना मनुष्य के लिए महामारी है या प्रकृति ने स्वयं को मानवजन्य प्रभाव से दूर करने का प्रयास किया है. वस्तुत: यह करुणा और करोना के बीच संघर्ष का काल है. करोना एक आसुरी प्रवृत्ति है जो धरती का चरित्र भी बदलना चाहती है. पर, जरूरत है कि हम अपने धर्म की मूल संवेदना करुणा को समझें.
यह सच है कि करुणा ही धर्म का आधार होता है. जितना पढ़ा और सीखा है मैंने, उससे इतना जान पाया हूँ कि संसार के सभी मतों में धर्म कभी किसी को आदेश या निर्देश नहीं देता है. धर्म हमें उपदेश या मार्ग दिखाता है. करुणा की संवेदना लिए हुए धर्म के पांच स्तम्भ हैं. त्याग, धैर्य, प्रेम, समर्पण और न्याय. मनुष्य में त्याग की भावना हमारे विवेक को स्थिर करती है. धैर्य या धीरज हमारे मन को स्थिर करता है. प्रेम हमारे हृदय को स्थिर करता है. समर्पण से शरीर, मन और आत्मा स्थिर होती है और अंत में धर्म का पांचवां स्तम्भ न्याय है जिससे हमारे कर्म और प्रारब्ध को पूर्णता मिलती है.
करुणा से रहित मनुष्य सांसे तो लेता है पर, वह जीवन से वंचित है. इस धरती पर हमारे होने का कोई अर्थ तो अवश्य है. हम इस प्रकृति का ही अंश हैं.. यह भूलना नहीं चाहिए. रिश्तों में स्वार्थ और कर्तव्य निष्पादन में ध्येय से ऊपर अहं नहीं होना चाहिए. अर्थ उपार्जन भी सीमाओं से परे नहीं है. हमारे कर्म और कर्तव्य सभी प्रश्नों से परे होना चाहिए.
अभी भी समय है हमें फिर से ठहर कर एक बार सोचना चाहिए. कहीं हमने अपनी दिशा खो तो नहीं दी है. स्वयं पर विश्वास के अतिरेक में कहीं हम अहंकारी तो नहीं हो गए. विकास की होड़ में कहीं करुणा से .. मानवता से.. धर्म से दूर तो नहीं हो गए. पूरे विश्व में करोड़ों लोग भूख के आतंक के सामने खड़े होने को विवश हैं. टूटती उम्मीदों के साथ हजारों पैर घरों की ओर जा रहे हैं. आइए इस लॉकडाउन में स्वयं को फिर से पाने की कोशिश करें. आ अब लौट चलें…अभी भी बहुत दूर नहीं भटके हैं हम।
अजय नाथ झा
चैत्र शुक्ल चतुर्दशी उपरांत पूर्णिमा
वि.सं 2077/ 07 अप्रैल 2020