अपने अहंकार की दीवार तोड़कर सहज होने की आवश्यकता है….
आज आषाढ़ शुक्ल गुरु पूर्णिमा है. जिसने भी किसी से कुछ सीखा है वह अपने सिखाने वाले को गुरु रूप में प्रणाम कर रहा है. इसमें प्रणाम करने वालों की उदारता अधिक है.
गुरु और ज्ञान तथा शिक्षक और शिक्षण पर आज बहुत चर्चा हो रही है. पर, मेरी समझ से यह चर्चा … परिचर्चा व्यर्थ है. ज्ञान दान है… विद्या व्यापार नहीं … ऐसे ही न जाने कितने तर्क.. कितनी बातें…। गुरु और शिक्षक का भेद बताते हुए अपने ज्ञान के अहंकार से कोई बाहर नहीं आ पाया।
आत्मबोध किससे और कब मिल जाये क्या पता ? हम सब में वह तत्व है.. जो महानता की ओर ले जाता है. वह व्यक्ति जो अपनी महानता का अहसास कराकर सामने वाले को उसकी लघुता या छोटेपन का बोध कराता है… वह केवल अज्ञानी और अहंकारी ही हो सकता है. किन्तु वह व्यक्ति जो सामने आने वाले को उसकी महानता का .. उसके महत्व का अहसास कराता है.. वही व्यक्ति महान होता है.. गुरु समान होता है.
एक बात कहूं …जब मैं अपने कार्यस्थल के लिए निकलता हूँ तब कॉरिडोर की साफ सफाई करने वाली महिला मुझे सम्मान देते हुए एक और खड़ी हो जाती है… उसकी विनम्रता भी मुझे सीखा जाती है. सागर की विशालता के सदृश हमारे आसपास ज्ञान का सागर भी बिखरा हुआ है. केवल अपने अहंकार की दीवार तोड़कर सहज होने की आवश्यकता है.
उन सबों को नमन जिन्होंने मुझे जगाया.. दीये की लौ बनकर राह दिखाया.
अजय नाथ झा
रविवार, 5 जुलाई 2020
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा
वि स 2077