
कोरोना की युग त्रासदी के बीच “पंचलैट” की रोशनी
फणीश्वर नाथ रेणु को हम सभी जानते हैं — गँवई भारत के मिट्टी की सौंधी महक लिए उनकी कहानियों में हमारी लोक संस्कृति आज भी जीवन्त है। 2017 में प्रेम प्रकाश मोदी दुमका में मुझसे मिले थे। वो रेणु की कथा “पंचलाइट” पर दुमका-देवघर में फ़िल्म की शूटिंग करना चाहते थे। मूवी का नाम “पंचलैट” था। दुमका के पांडेश्वरनाथ में फ़िल्म की शूटिंग होगी इस बात को लेकर मैं उत्साहित था। इसी बहाने यह जगह चर्चा में तो आएगी। दुमका के 108 मंदिरों के गाँव मलुटी के लिए 2005 से चल रहा सामूहिक प्रयास 2015-16 में अपने चरम सफलता की ओर था। परन्तु, बहुत कम लोग जानते हैं कि शक्तिपीठ बैद्यनाथ धाम के पूर्व में दारुकवन में वासुकिनाथधाम सहित शिव के शक्ति-स्वरूप में तंत्र साधना से जुड़े तथा बौद्ध धर्म के महायान/वज्रयान से प्रभावित कई महत्वपूर्ण केंद्र हैं, जिस ओर अभी सबकी दृष्टि पड़ी नहीं है। पांडेश्वरनाथ के प्रचार प्रसार के इसी लोभ से और अपने कर्तव्य के तहत मैंने इस फ़िल्म के निर्माण में शासन और ज़िला एवं स्थानीय प्रशासन से हर सम्भव सहयोग प्रेम प्रकाश मोदी जी को दिलाया।
बहरहाल, ‘पंचलैट’ फ़िल्म दुमका के पांडेश्वरनाथ और देवघर के सारठ में शूट की गयी। समय बीत गया और मैं भी स्थानांतरित होकर राँची आ गया । नवम्बर 2018 में एक दिन जब ‘पंचलैट’ को 49वें IITF में ‘ऑफिसियल सिलेक्शन’ के लिए चुने जाने की सूचना मिली, तब मुझे लगा प्रेम मोदी जी ने न केवल रेणुजी की कथा के साथ जरूर न्याय किया होगा गोया फ़िल्म भी उत्कृष्ट ही बनायी होगी। फिर कई फ़िल्म फ़ेस्टिवलों में इसकी सराहना और सम्मान की ख़बर मिलती रही।
2020 में कोरोना की आहट और झारखण्ड के प्रवासी मज़दूरों को वापस लाने और उनके असाध्य कष्ट को महसूस करते हुए समय और कर्तव्य आगे बढ़ता रहा। इसी बीच लिवर सिरोसिस से डेढ़ माह के संघर्ष के बाद 18 दिसम्बर 2020 को अपनी बहिन को खोने के बाद मेरा मन पूरी तरह उचाट सा हो गया। मेरे लिए गृह जिला बेतिया वीरान सा हो गया। अपने भीतर बहुत कुछ टूटता हुआ महसूस कर रहा था। माँ-बाबूजी को लेकर राँची आ गया। फिर, 2021 के मध्य अप्रैल से मई के पहले सप्ताह के बीच कोरोना के दूसरे लहर की त्रासदी ने पूरे भारत को झकझोर दिया, लगभग सबों ने किन्ही अपनों को खोया, सब लोग अपने या अपनों के इलाज के लिए तड़पे ; मायूसी और दर्द के बीच भी हम सबका अपने कर्तव्य पथ पर संघर्ष चल ही रहा था। तभी, इसी बीच एक दिन सोशल मीडिया से पता चला कि ‘पंचलैट’ फ़िल्म MX Player पर उपलब्ध है, कौतूहल वश मैंने एक दिन देखा इसे – दुमका से अपने लगाव के कारण दो बार देखा। फ़िल्म में दुमका के अलग अलग लोकेशन का बहुत सुंदर उपयोग हुआ है।
1954 ईसवी का एक गाँव… ‘पंचलैट’ फ़िल्म में यह गाँव और वह समय-खंड फिर से जी उठा है। इस सलीमा (सिनेमा) के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक नहीं हैं। इस सूत्र वाक्य से यह सलीमा शुरू होती है। गाँव में है एक ‘महतो टोला’ । हर टोले का अपना स्वाभिमान होता है। उस टोले की अपनी विवशता और मजबूरियाँ भी हुआ करती हैं। पर, इन सबसे उपर है – टोले की जिजीविषा अर्थात् सामूहिकता में जीवन जीने की अकूत चाहत। यह सब फ़िल्म में बखूबी साकार हुआ है। हर शहरी आवारा नहीं होता – गोधन के मूल्य उसकी समझदारी, उसका अपने प्रेम पर यक़ीन, मुनरी की माँ की नफ़रत को बदल सकने का विश्वास, मुनरी की समझदारी और प्रेम को परखने की शक्ति और अंत में पंचलैट के जलते ही न केवल टोला का स्वाभिमान जी उठता है बल्कि सामूहिकता में जीवन जीने की चाहत जी उठती है।
हम आप सब भी कहीं न कहीं 2021 में मिले कोरोना दर्द से व्यथित हैं। पीड़ा कितनी भी बड़ी हो; जीवन को आगे बढ़ना ही होता है। पर, वह व्यथा भी साथ-साथ साँस लेती है- जीवन की आख़िरी लम्हें तक। चलिए, इस दर्द को जीते हुए एक बार आप सब भी जिजीविषा से भरी हुई रेणु जी की कथा पर आधारित इस ‘पंचलैट’ सलीमा (सिनेमा) को अवश्य देखिये।
©️ अजय नाथ झा
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