बाणभट्ट की महामाया के अमृत पुत्र…

तुमने कल ही तो कहा था कि ….

आज पता नहीं क्यों बाणभट्ट की आत्मकथा की महामाया का अमृतपुत्रों का आह्वान करता जाग्रत विग्रह दृष्टि पथ पर बार बार आ रहा है…

तुम्हारी बातों से अतीत आँखों में जी उठा.. तीन कालखंड की एक समान स्थिति या प्रासंगिक परिस्थिति को सामने ला खड़ा कर दिया है। बाणभट्ट का देश-काल, दूसरा वह समय खण्ड जिस समय बाण भट्ट की आत्मकथा(स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी) सृजित हुई और तीसरा कालखंड आज जिसमें हम तुम जी रहे हैं।

सबसे पहले उस कालखंड की चर्चा और महामाया का आह्वान गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत का बिखराव- सातवीं शताब्दी का इतिहास और समाज जो उथल पुथल का इतिहास रहा। महामाया के द्वारा अमृत पुत्रों के आह्वान की प्रासंगिकता 1946 (पुस्तक का लेखन वर्ष) में भी रही थी। पारस्परिक संघर्ष, अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बगावत, अहिंसा और सांप्रदायिक राजनीति, परंपरागत मूल्यों को अस्वीकार कर रहा समाज .. ऐसे कई सवाल तत्समय के संदर्भों से इस रचना को जोड़ते हैं। महामाया के अमृत पुत्रों का आह्वान ऐतिहासिक होते हुए भी तत्कालीन संदर्भों में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखती है।

और, महामाया आज भी तुम्हारी प्रतीक्षा है और तुम आओगे तब तो युवा देश भारत का कण कण अमृत पुत्र से जीवन्त हो सकेगा। महामाया बहुत प्रासंगिक हो आज भी तुम।

प्रासंगिक है मनुष्य और मनुष्यता, प्रासंगिक है नित छीजती नैतिकता, प्रासंगिक है हतदर्प जन मानस की जिजीविषा।

आज जरूरत है अपने डर पर विजय –न झूठ की आत्मा पर बनाये गए सत्य के महल से डर हो, न अहंकारी गुरु से डर हो, न मंत्र से डर हो, न लोक से डर हो, न वेद-पुराण से डर हो। कोई डर नहीं। इस संसार में कहीं कोई अंतिम सत्य नहीं। समय की गति से अपने-अपने संदर्भों में सत्य बदलता रहता है।

सभी संदर्भों में, सभी प्रसंगों में और सभी कालखंडों में मनुष्य और मनुष्य की मनुष्यता महत्वपूर्ण है। यह दुनिया अपनी निजता में स्त्री को केवल एक देह मात्र मानती रही और अपने व्याख्यानों में, शास्त्रों में और अवधारणाओं में स्त्री को देव मंदिर के समान –करुणा की मूर्ति मानती रही है। यह एक बड़ा विपर्यय था और आज भी है। तब भी नारी के प्रति सामंतवादी दृष्टि को बदलने, सम्राट और राजा के अंत:पुर के बंधन बनी अपहृता नारियों को स्वतंत्र करने का प्रयास और संघर्ष विद्यमान था। स्वतंत्रता पूर्व दशक भी इस संघर्ष का गवाह था और आज भी नारी को नारियोचित संवेदना से अलग केवल देह मात्र मानना सत्य पर्याय बन गया है। नारी तमाम जागरूकता के बाद भी आज व्यष्टि और समष्टि स्तर पर बर्बरता का शिकार है।

ऐसे में महामाया के शब्दों में सामंतवादी चरित्र व्यवस्था का विरोध और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का आह्वान है जिसमें सब के हितों की रक्षा संभव है जो राष्ट्र की अवधारणा का उद्देश्य है । वह आह्वान आज भी प्रासंगिक है।

प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक चरित्र होता है और यह चरित्र उस राष्ट्र के लोगों के चरित्र से बनता है। जब हम अपने दैनिक जीवन में कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं और आज जब हम अपने कर्तव्य स्थल पर दिए गए दायित्वों के प्रति अपेक्षित न्याय करते हैं, तब जाकर हम अपने चरित्र का निर्माण करते हैं। यदि संपूर्ण भारत के चरित्र की बात हो तो बहुत विडंबनापूर्ण सच्चाई तब भी थी और आज भी है। सोन नदी के तट पर विंध्याचल के उस पार से इस पार की कहानी जैसी भी रही हो, आज बस उस राष्ट्र की जरूरत है जो अपने स्पन्दन से झंकृत करे उसे बताएं क्या अपेक्षित है? संपूर्ण विश्व को अपना एक परिवार मानने वाला राष्ट्र आज अपनी परिभाषा के निर्माण के लिए संघर्षरत है । हमेशा लोग कहते हैं विविधताओं में एकता भारत की विशिष्टता है। मैंने जितना पढ़ा और जाना है जितना समझा है अंतर्विरोधों में सामंजस्य ही भारत का मूल चरित्र है। विरोध और अंतर्विरोध सच है और तब भी सच ही था परंतु इस सच को स्वीकार कर सामंजस्य बनाते हुए आगे बढ़ना ही भारत का पर्याय है । महामाया के अमृत पुत्र पूर्वी क्षितिज पर आलोकित होंगे और देखेंगे हम भारत को कैसे और किस दिशा में ले जा रहे हैं।

वक़्त आज का यादें उन दिनों की…

National Public Relations Day (April 21) पर आज 23rd April को My Vote My Right विषय पर आयोजित कार्यक्रम मुझे सेंट्रल यूनिवर्सिटी ब्राम्बे में मास कम्युनिकेशन के स्टूडेंट्स से मिलने का मौका मिला. St Xavier’s College Gossner College के मास कॉम के स्टूडेंट्स भी थे।

PRSI के रांची चैप्टर के चेयरमैन दीपक जी ने जब आमंत्रण दिया तो CUJ जाने के नाम पर मैं मना नहीं कर पाया. सन 2011 में जब नेशनल गेम्स के 6 दिन पहले जब मीडिया सेंटर की जिम्मेवारी मिली थी तब CUJ के 80 से अधिक मास कॉम स्टूडेंट्स के साथ मैंने सफलतापूर्वक मीडिया सेन्टर का सञ्चालन करते हुए इसे एक जिम्मेवार और विश्वसनीय बनाया था.

सत्यजीत, अंशुल, नेहा, ऋषभ …. इन यादों के साथ पहुँचा पर बहुत कुछ आबोहवा अलग सी थी. आज के कार्यक्रम को इस विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर श्रीमती रश्मि ने सफलतापूर्वक डिजाईन किया हुआ था. कल उनसे भी बात हुई. मुझे याद है… जब मैं PRD में था तब फिल्म फेस्टिवल हो या कुछ और अनेकों बार रश्मिजी और राजेश के सहयोग से सभी कार्यक्रमों में इनकी भागीदारी मिला करती थी. आज भी उतनी ही गर्मजोशी दिखी. CUJ पहुँचने पर सबसे पहले विश्व्केश से मिलना बोनस ही रहा. नेतरहाट विद्यालय के अपने इस जूनियर को यहाँ हिंदी का असिस्टेंट प्रोफेसर देखकर मन प्रसन्न हुआ. साथ ही आभार के साथ आज के कार्यक्रम के कुछ और नाम जिनसे रूबरू हुआ, वे थे Dr Dev Vrat Singh, Dean and Head of mass communication, Shri Deepak Kumar Chairman, PRSI, Shri Rabindra Kumar, Shrimati Rashmi, Shri Vishwkesh, Shri Rajesh, Shri Anupam Rana, Ms Sumedha Chaudhary, Neha और भी कुछ महत्वपूर्ण नाम…