मन मेघपुष्प

मन मेघपुष्प
सब पत्थर.. जड़/ पानी पत्थर/ हवा पत्थर..
स्थिर सृष्टि../ शब्द शिला…/ बोध प्रस्तर..
दृष्टि अश्म../ पाषाण हृदय..
फिर भी, / मन मेघपुष्प
नीलाभ अनन्त की ओर क्यों तक रहा
@अजय नाथ झा

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सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

तीन दिनों तक उत्तर कोयल के किनारों पर

औरंगा के बयारों में

चियांकी के मैदान पर

सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

देश के प्रधान ने आना था वहां

लाखों के आहट की प्रतीक्षा थी

उम्मीदों की बाट जोहते पलामू में

सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

जनवरी में धूप की ऐसी जलन?

और कांपती सर्द रात की हवाओं में

तसल्ली की रेत भरी हथेली पर..

सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे.

समस्त कोलाहल में

दौड़ते भागते ऊबते पलों में

पहाड़ों घने जंगलों के बीच

सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे.

अंधेरी सड़कों पर

भागती गाड़ियों के बीच

दायित्वों के बाढ़ में

सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे

“तुम” मेरा ही एकान्त… मेरा ही अक़्स

जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है…

जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है…

शाम हो रही है….सूरज बस ढलने को ही है। कल सुबह आसमान में सूरज तो फिर से अपनी रोशनी से अन्धकार को हर लेगा…लोग उम्मीद से दिन की शुरूआत करेंगे।

एक और शाम दस्तक दे रही है अन्धेरा पसर रहा है… पर यह अनन्त तक फैला हुआ है। कोई सूरज उम्मीद का उजाला नहीं परोसेगा। इसे काल का तम भी नहीं कह सकते हैं … यह मृत्यु का पार्थिव यथार्थ नहीं है।

यह शाम कुछ और ही है …. यह सांझ मन के टूटने और हारने से उपजती है। यह प्रेम की संवेदना पर लौकिकता का अन्धेरा है। जब मन टूटता है तब जिजीविषा की शाम दस्तक दे जाती है। …. और तब जो अन्धेरा पसरता है वह अनन्त और विराट है। व्यथा का सागर ही सच है जिसमें समस्त सुख की नदियां विलीन हो जाती हैं …. इस घोर निबिड़ तम में सृजन के लिये उपजती व्यथा कथा … जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है।

है भीड़ इतनी पर दिल अकेला

है भीड़ इतनी पर दिल अकेला…

कुछ ऐसे जीवन होते हैं जो समय के शुष्क शिला पर अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते हैं। नीरज ऐसे ही गीतकार थे। उनके गीतों को याद करना एक सुखद अनुभव है… कहता है जोकर सारा ज़माना/ आधी हक़ीक़त आधा फ़साना

इस चुटीले अन्दाज़ में दर्द को बयां करना गोपाल दास नीरज ही जानते थे। अपना देश और इसकी आबोहावा के वे क़ायल थे कहाँ रे हिमालय ऐसा, कहाँ ऐसा पानी/ यही वो ज़मीं जिसकी दुनिया दीवानी/ सुंदर ना ऐसी कोई जैसी धरती हमारी

भारत एक है इसकी एक ही ख़ुशबू है…. फूल हम हज़ारों लेकिन, ख़ुशबू एक हमारी।

ऐसे लोग बार बार नहीं जन्म लेते।

फिर से जी उठा है जीवन

बरसात के हारे हुए बादलों सी सांझ रात
दूर पहाड़ी मंदिर की रोशनी
दूसरी ओर टैगोर हिल का वीरान सा मंडप
अमावस से पहले की स्याह रात।।
मैं वक़्त की ओर वक़्त मेरी ओर तक रहा।
दोनों ही बीत रहे…
बेबसी हम दोनों की है..
देखना सत्य को…
जूझते और हारते हुए।।

वक़्त ने कहा..
जो था कभी वो अब नहीं;
जो आज है वो कल नहीं.
मैं निरंतर बह रहा..
बह रहे तुम भी मेरे प्रवाह में..
बिन पतवार की नाव पर हो सवार।

आज तमस का वैराट्य है लीलने को
तभी स्याह आसमां के पश्चिमी क्षितिज पर
उम्मीद की रौशनी लिए
जुगनुओं की आहट..
फिर से जी उठा है जीवन
©ajaynathjha

कौन है जो मुझमें होकर भी मेरा नहीं है.. मेरे अंधेरों को लीलता हुआ दिये की लौ सा है.


कौन है जिसे हम आईने में नहीं अपने आप में ढूंढते हैं. अपने ही अक्स में घुल मिल सा गया है. वह मैं नहीं हूँ
, पर वह कोई और भी नहीं है. वह मेरे ही स्पन्दन से शब्द और आकार लेता है. सागर सा विस्तार है पर वह ओस की बूंद में भी समाया हुआ है.

“ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये॥’

ओह ! आज बादलों के बीच पूर्णिमा अपने चरम पर है; याद आते हो #कबीर इस पूर्णिमा में; काशी में जन्म; #मग़हर में अंतिम साँस; इतने वर्षों बाद भी आप सही और प्रासंगिक; आज #PMInMaghar पीएम मग़हर आए ; संत सत्ता को नहीं; सत्ता संत की ओर आयी।
यही संदेश कि “ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये॥’

अत्तदीपा विहरथ Be Island Unto yourself.

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आज बुद्ध पूर्णिमा है आज ही बुद्ध का जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और उनका इस संसार से विदा लेना महापरिनिर्वाण सब वैशाख पूर्णिमा को ही हुआ. दुखों से भरे संसार में व्याप्त हिंसा, अन्यायपूर्ण व्यवस्था और अंततः मृत्यु से जीवन का अंत ने उन्हें ज्ञान साधना से जीवन के मध्यम मार्ग अर्थात् अपेक्षा उम्मीद और आशा विहीन अपने कर्म पर केन्द्रित रहते हुए सरलता से जीवन जीने की राह को सबके सामने रखा. बुद्ध ने तत्समय की लोकभाषा पालि में अपनी बात जनसाधारण के सामने रखी. उन्होंने कहा अत्तदीपा विहरथ अर्थात Be Island Unto yourself. “Monks, be islands unto yourselves, be your own refuge, having no other; let the Dhamma be an island and a refuge to you, having no other.

नेतरहाट विद्यालय का सूत्र सन्देश है “अत्तदीपा विहरथ”. बौद्ध दर्शन के अर्थपूर्ण सन्देश का निहितार्थ था कि बौद्ध भिक्षु जो सूत्र सन्देश “अत्तदीपा विहरथ” को समझकर स्वयं के या धम्म के द्वीप बनेंगे — Those who are islands unto themselves… should investigate to the very heart of things: ‘What is the source of sorrow, lamentation, pain, grief and despair? How do they arise?’ यही बौद्ध भिक्षुओं और वर्तमान में नेतरहाट से शिक्षित बच्चों से अपेक्षित आदर्श कार्य है …. कर्तव्यनिष्ठ, अहिंसक, प्रेमपूर्ण और सादगी जीवन ही वैशाख पूर्णिमा का सन्देश है.

नेतरहाट विद्यालय, झारखण्ड

मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती हैं….

मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती हैं….

4 मार्च को रेणु जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन –

तीसरी कसम की आखिरी पंक्तियां पढिये….

उसने उलट कर देखा, बोरे भी नहीं, बाँस भी नहीं, बाघ भी नहीं -परी ..देवी ..मीता .हीरादेवी ..महुआ घटवारिन -को-ई नहीं। मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती है। हिरामन के होंठ हिल रहे हैं। शायद वह तीसरी कसम खा रहा है -कंपनी की औरत की लदनी..

मैला आंचल के लेखक फणीश्वर नाथ रेणु को याद करना प्रासंगिक है.1947 में आजाद हुए भारत के क्रूर यथार्थ का चित्रण “मैला आंचल” –ग्रामीण भारत के यथार्थ का दस्तावेज है। 1936 में प्रेमचंद के गोदान में जहां आदर्श टूट रहे थे वही 1954 में मैला आँचल में भारत के घाव को उसी तरह रख दिया गया है.
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क्या वीरता, मूल्यों और आदर्शों के चित्तौड़ को हर बार राघव चेतन और ख़िलजी छलते रहेंगे ?

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क्या वीरता, मूल्यों और आदर्शों के चित्तौड़ को हर बार राघव चेतन और ख़िलजी छलते रहेंगे…..?

जायसी और भंसाली दोनों का पद्मावत हमारे सामने है-प्रासंगिक है। चित्तौड़ और दिल्ली की तुलना में दोनों ही गाथाओं की संवेदना चित्तौड़ के ह्रदय के अधिक करीब है। जायसी ने केवल साहित्य रचा। मसनवी शैली में लिखा गया प्रेम और शौर्य की ही अभिव्यक्ति है।
शौर्य गाथा चित्तौड़ किले के द्वार पर राजा रत्न सेन और दिल्ली के शहंशाह ख़िलजी की लड़ाई ; दो सत्ताधारियों के बीच परस्पर युद्ध मे जब ख़िलजी मृत्यु के द्वार पर था तभी रत्न सेन की छल से हत्या करता है। वीर रत्न सेन ने ख़िलजी से कहा कि कम से कम तुम इस युद्ध में तो उसूलों का पालन करते ; पर ख़िलजी ने कहा सिर्फ जीत ही ध्येय है मेरा, मेरे लिए युद्ध में धोखा और फ़रेब सब जायज़ है । उस दिन रत्न सेन मरकर भी शौर्य गाथा का नायक बनता है। आज भी रत्न सेन को ही मरना पड़ता है।

पद्मावत का शौर्य मुख्यतः मेवाड़ के अदम्य वीर गोरा और बादल का है और शौर्य सिंहल कन्या मेवाड़ की रानी पद्मिनी का है।

दूसरी ओर ख़िलजी और राघव चेतन धोखा, अधर्म, अन्याय और क्रूरता के प्रतीक थे।

पद्मिनी का सौंदर्य सिंहल द्वीप की संवेदना थी, जो चित्तौड़ का आन बान और शान बनी और अन्ततः जो ख़िलजी की दिल्ली के लिए नश्वर प्रकृति में विलीन अपराजेय राख और मिट्टी बनकर रह गई।

रानी पद्मिनी का जौहर उस जमाने की सती प्रथा जैसा नहीं था। जिस चित्तौड़ के तीस हजार पुरुषों और बच्चों ने किले की रक्षा में अपना बलिदान दिया और उसी बलिदान को चर्मोत्कर्ष तक पहुंचाया पद्मिनी और महल की महिलाओं के जौहर ने। भारत का इतिहास उन महिलाओं के मान और सम्मान को आज भी नमन करता है। रानी पद्मिनी और उनकी वीरता आगे आने वाले वर्षों में भी विश्व चेतना को गौरव के साथ आंदोलित करेगी ।

पर, आज भी राघव चेतन घाव दे रहा है — ख़िलजी की प्रतिनैतिकता आज भी प्रासंगिक है– आगे आने वाले वर्षों में भी राघव चेतन, ख़िलजी जैसी प्रास्थितियां भारत की नींव पर प्रहार करती रहेंगी। ख़िलजी सा छल विद्यमान होगा। कल भी पद्मिनी, गोरा, बादल, रत्न सेन ने ही बलिदान दिया था— आज भी इनका ही अंत प्रासंगिक है —- आगे भी इनका अंत ही नियति रहेगी पर, इनके शौर्य और यश की गाथा गूंजती रहेगी। सत्य इनके साथ रहेगा।

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