दीपावली

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!!

झारखंड से बादल दूर जा रहे हैं। सबकी दीपावली अच्छी बनेगी। मध्य भारत में वर्षा हो रही है। अरब सागर के बीच में चक्रवात अभी भी कायम है।

भरोसा है.. आज हर घर में मिट्टी के पांच दीये जरूर जलेंगे।

एक दीया जो कष्ट और दुख रूपी समस्त अंधेरा दूर करे, दूसरा दीया स्वच्छता का जो धरा पर प्रदूषण और गंदगी दूर करे। तीसरा दीया जो हर व्यक्ति के मन में व्याप्त अंधेरा दूर करे। चौथा दीया ईश्वर को इस प्रार्थना के साथ कि सूरज, चांद और तारों की रोशनी हमारी धरती पर सदैव कायम रहे। पांचवां दीया अपने आत्मविश्वास का…इस दुनिया में व्याप्त तमाम अविश्वास…षड्यंत्र और धोखे से रोज़ टूटते.. छीजते मन पर विश्वास की रोशनी बनी रहे।

मन मेघपुष्प

मन मेघपुष्प
सब पत्थर.. जड़/ पानी पत्थर/ हवा पत्थर..
स्थिर सृष्टि../ शब्द शिला…/ बोध प्रस्तर..
दृष्टि अश्म../ पाषाण हृदय..
फिर भी, / मन मेघपुष्प
नीलाभ अनन्त की ओर क्यों तक रहा
@अजय नाथ झा

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10217686077479223&id=1098395232

सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

तीन दिनों तक उत्तर कोयल के किनारों पर

औरंगा के बयारों में

चियांकी के मैदान पर

सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

देश के प्रधान ने आना था वहां

लाखों के आहट की प्रतीक्षा थी

उम्मीदों की बाट जोहते पलामू में

सोचा नहीं था कि तुम मिल जाओगे..

जनवरी में धूप की ऐसी जलन?

और कांपती सर्द रात की हवाओं में

तसल्ली की रेत भरी हथेली पर..

सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे.

समस्त कोलाहल में

दौड़ते भागते ऊबते पलों में

पहाड़ों घने जंगलों के बीच

सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे.

अंधेरी सड़कों पर

भागती गाड़ियों के बीच

दायित्वों के बाढ़ में

सोचा नहीं था तुम मिल जाओगे

“तुम” मेरा ही एकान्त… मेरा ही अक़्स

जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है…

जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है…

शाम हो रही है….सूरज बस ढलने को ही है। कल सुबह आसमान में सूरज तो फिर से अपनी रोशनी से अन्धकार को हर लेगा…लोग उम्मीद से दिन की शुरूआत करेंगे।

एक और शाम दस्तक दे रही है अन्धेरा पसर रहा है… पर यह अनन्त तक फैला हुआ है। कोई सूरज उम्मीद का उजाला नहीं परोसेगा। इसे काल का तम भी नहीं कह सकते हैं … यह मृत्यु का पार्थिव यथार्थ नहीं है।

यह शाम कुछ और ही है …. यह सांझ मन के टूटने और हारने से उपजती है। यह प्रेम की संवेदना पर लौकिकता का अन्धेरा है। जब मन टूटता है तब जिजीविषा की शाम दस्तक दे जाती है। …. और तब जो अन्धेरा पसरता है वह अनन्त और विराट है। व्यथा का सागर ही सच है जिसमें समस्त सुख की नदियां विलीन हो जाती हैं …. इस घोर निबिड़ तम में सृजन के लिये उपजती व्यथा कथा … जो संसार को सूर्य सदृश आस्था दे जाती है।

है भीड़ इतनी पर दिल अकेला

है भीड़ इतनी पर दिल अकेला…

कुछ ऐसे जीवन होते हैं जो समय के शुष्क शिला पर अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते हैं। नीरज ऐसे ही गीतकार थे। उनके गीतों को याद करना एक सुखद अनुभव है… कहता है जोकर सारा ज़माना/ आधी हक़ीक़त आधा फ़साना

इस चुटीले अन्दाज़ में दर्द को बयां करना गोपाल दास नीरज ही जानते थे। अपना देश और इसकी आबोहावा के वे क़ायल थे कहाँ रे हिमालय ऐसा, कहाँ ऐसा पानी/ यही वो ज़मीं जिसकी दुनिया दीवानी/ सुंदर ना ऐसी कोई जैसी धरती हमारी

भारत एक है इसकी एक ही ख़ुशबू है…. फूल हम हज़ारों लेकिन, ख़ुशबू एक हमारी।

ऐसे लोग बार बार नहीं जन्म लेते।

फिर से जी उठा है जीवन

बरसात के हारे हुए बादलों सी सांझ रात
दूर पहाड़ी मंदिर की रोशनी
दूसरी ओर टैगोर हिल का वीरान सा मंडप
अमावस से पहले की स्याह रात।।
मैं वक़्त की ओर वक़्त मेरी ओर तक रहा।
दोनों ही बीत रहे…
बेबसी हम दोनों की है..
देखना सत्य को…
जूझते और हारते हुए।।

वक़्त ने कहा..
जो था कभी वो अब नहीं;
जो आज है वो कल नहीं.
मैं निरंतर बह रहा..
बह रहे तुम भी मेरे प्रवाह में..
बिन पतवार की नाव पर हो सवार।

आज तमस का वैराट्य है लीलने को
तभी स्याह आसमां के पश्चिमी क्षितिज पर
उम्मीद की रौशनी लिए
जुगनुओं की आहट..
फिर से जी उठा है जीवन
©ajaynathjha

कौन है जो मुझमें होकर भी मेरा नहीं है.. मेरे अंधेरों को लीलता हुआ दिये की लौ सा है.


कौन है जिसे हम आईने में नहीं अपने आप में ढूंढते हैं. अपने ही अक्स में घुल मिल सा गया है. वह मैं नहीं हूँ
, पर वह कोई और भी नहीं है. वह मेरे ही स्पन्दन से शब्द और आकार लेता है. सागर सा विस्तार है पर वह ओस की बूंद में भी समाया हुआ है.

“ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये॥’

ओह ! आज बादलों के बीच पूर्णिमा अपने चरम पर है; याद आते हो #कबीर इस पूर्णिमा में; काशी में जन्म; #मग़हर में अंतिम साँस; इतने वर्षों बाद भी आप सही और प्रासंगिक; आज #PMInMaghar पीएम मग़हर आए ; संत सत्ता को नहीं; सत्ता संत की ओर आयी।
यही संदेश कि “ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये॥’

बाणभट्ट की महामाया के अमृत पुत्र…

तुमने कल ही तो कहा था कि ….

आज पता नहीं क्यों बाणभट्ट की आत्मकथा की महामाया का अमृतपुत्रों का आह्वान करता जाग्रत विग्रह दृष्टि पथ पर बार बार आ रहा है…

तुम्हारी बातों से अतीत आँखों में जी उठा.. तीन कालखंड की एक समान स्थिति या प्रासंगिक परिस्थिति को सामने ला खड़ा कर दिया है। बाणभट्ट का देश-काल, दूसरा वह समय खण्ड जिस समय बाण भट्ट की आत्मकथा(स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी) सृजित हुई और तीसरा कालखंड आज जिसमें हम तुम जी रहे हैं।

सबसे पहले उस कालखंड की चर्चा और महामाया का आह्वान गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत का बिखराव- सातवीं शताब्दी का इतिहास और समाज जो उथल पुथल का इतिहास रहा। महामाया के द्वारा अमृत पुत्रों के आह्वान की प्रासंगिकता 1946 (पुस्तक का लेखन वर्ष) में भी रही थी। पारस्परिक संघर्ष, अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बगावत, अहिंसा और सांप्रदायिक राजनीति, परंपरागत मूल्यों को अस्वीकार कर रहा समाज .. ऐसे कई सवाल तत्समय के संदर्भों से इस रचना को जोड़ते हैं। महामाया के अमृत पुत्रों का आह्वान ऐतिहासिक होते हुए भी तत्कालीन संदर्भों में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखती है।

और, महामाया आज भी तुम्हारी प्रतीक्षा है और तुम आओगे तब तो युवा देश भारत का कण कण अमृत पुत्र से जीवन्त हो सकेगा। महामाया बहुत प्रासंगिक हो आज भी तुम।

प्रासंगिक है मनुष्य और मनुष्यता, प्रासंगिक है नित छीजती नैतिकता, प्रासंगिक है हतदर्प जन मानस की जिजीविषा।

आज जरूरत है अपने डर पर विजय –न झूठ की आत्मा पर बनाये गए सत्य के महल से डर हो, न अहंकारी गुरु से डर हो, न मंत्र से डर हो, न लोक से डर हो, न वेद-पुराण से डर हो। कोई डर नहीं। इस संसार में कहीं कोई अंतिम सत्य नहीं। समय की गति से अपने-अपने संदर्भों में सत्य बदलता रहता है।

सभी संदर्भों में, सभी प्रसंगों में और सभी कालखंडों में मनुष्य और मनुष्य की मनुष्यता महत्वपूर्ण है। यह दुनिया अपनी निजता में स्त्री को केवल एक देह मात्र मानती रही और अपने व्याख्यानों में, शास्त्रों में और अवधारणाओं में स्त्री को देव मंदिर के समान –करुणा की मूर्ति मानती रही है। यह एक बड़ा विपर्यय था और आज भी है। तब भी नारी के प्रति सामंतवादी दृष्टि को बदलने, सम्राट और राजा के अंत:पुर के बंधन बनी अपहृता नारियों को स्वतंत्र करने का प्रयास और संघर्ष विद्यमान था। स्वतंत्रता पूर्व दशक भी इस संघर्ष का गवाह था और आज भी नारी को नारियोचित संवेदना से अलग केवल देह मात्र मानना सत्य पर्याय बन गया है। नारी तमाम जागरूकता के बाद भी आज व्यष्टि और समष्टि स्तर पर बर्बरता का शिकार है।

ऐसे में महामाया के शब्दों में सामंतवादी चरित्र व्यवस्था का विरोध और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का आह्वान है जिसमें सब के हितों की रक्षा संभव है जो राष्ट्र की अवधारणा का उद्देश्य है । वह आह्वान आज भी प्रासंगिक है।

प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक चरित्र होता है और यह चरित्र उस राष्ट्र के लोगों के चरित्र से बनता है। जब हम अपने दैनिक जीवन में कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं और आज जब हम अपने कर्तव्य स्थल पर दिए गए दायित्वों के प्रति अपेक्षित न्याय करते हैं, तब जाकर हम अपने चरित्र का निर्माण करते हैं। यदि संपूर्ण भारत के चरित्र की बात हो तो बहुत विडंबनापूर्ण सच्चाई तब भी थी और आज भी है। सोन नदी के तट पर विंध्याचल के उस पार से इस पार की कहानी जैसी भी रही हो, आज बस उस राष्ट्र की जरूरत है जो अपने स्पन्दन से झंकृत करे उसे बताएं क्या अपेक्षित है? संपूर्ण विश्व को अपना एक परिवार मानने वाला राष्ट्र आज अपनी परिभाषा के निर्माण के लिए संघर्षरत है । हमेशा लोग कहते हैं विविधताओं में एकता भारत की विशिष्टता है। मैंने जितना पढ़ा और जाना है जितना समझा है अंतर्विरोधों में सामंजस्य ही भारत का मूल चरित्र है। विरोध और अंतर्विरोध सच है और तब भी सच ही था परंतु इस सच को स्वीकार कर सामंजस्य बनाते हुए आगे बढ़ना ही भारत का पर्याय है । महामाया के अमृत पुत्र पूर्वी क्षितिज पर आलोकित होंगे और देखेंगे हम भारत को कैसे और किस दिशा में ले जा रहे हैं।

अत्तदीपा विहरथ Be Island Unto yourself.

images

आज बुद्ध पूर्णिमा है आज ही बुद्ध का जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और उनका इस संसार से विदा लेना महापरिनिर्वाण सब वैशाख पूर्णिमा को ही हुआ. दुखों से भरे संसार में व्याप्त हिंसा, अन्यायपूर्ण व्यवस्था और अंततः मृत्यु से जीवन का अंत ने उन्हें ज्ञान साधना से जीवन के मध्यम मार्ग अर्थात् अपेक्षा उम्मीद और आशा विहीन अपने कर्म पर केन्द्रित रहते हुए सरलता से जीवन जीने की राह को सबके सामने रखा. बुद्ध ने तत्समय की लोकभाषा पालि में अपनी बात जनसाधारण के सामने रखी. उन्होंने कहा अत्तदीपा विहरथ अर्थात Be Island Unto yourself. “Monks, be islands unto yourselves, be your own refuge, having no other; let the Dhamma be an island and a refuge to you, having no other.

नेतरहाट विद्यालय का सूत्र सन्देश है “अत्तदीपा विहरथ”. बौद्ध दर्शन के अर्थपूर्ण सन्देश का निहितार्थ था कि बौद्ध भिक्षु जो सूत्र सन्देश “अत्तदीपा विहरथ” को समझकर स्वयं के या धम्म के द्वीप बनेंगे — Those who are islands unto themselves… should investigate to the very heart of things: ‘What is the source of sorrow, lamentation, pain, grief and despair? How do they arise?’ यही बौद्ध भिक्षुओं और वर्तमान में नेतरहाट से शिक्षित बच्चों से अपेक्षित आदर्श कार्य है …. कर्तव्यनिष्ठ, अहिंसक, प्रेमपूर्ण और सादगी जीवन ही वैशाख पूर्णिमा का सन्देश है.

नेतरहाट विद्यालय, झारखण्ड