मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती हैं….

मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती हैं….

4 मार्च को रेणु जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन –

तीसरी कसम की आखिरी पंक्तियां पढिये….

उसने उलट कर देखा, बोरे भी नहीं, बाँस भी नहीं, बाघ भी नहीं -परी ..देवी ..मीता .हीरादेवी ..महुआ घटवारिन -को-ई नहीं। मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती है। हिरामन के होंठ हिल रहे हैं। शायद वह तीसरी कसम खा रहा है -कंपनी की औरत की लदनी..

मैला आंचल के लेखक फणीश्वर नाथ रेणु को याद करना प्रासंगिक है.1947 में आजाद हुए भारत के क्रूर यथार्थ का चित्रण “मैला आंचल” –ग्रामीण भारत के यथार्थ का दस्तावेज है। 1936 में प्रेमचंद के गोदान में जहां आदर्श टूट रहे थे वही 1954 में मैला आँचल में भारत के घाव को उसी तरह रख दिया गया है.
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क्या वीरता, मूल्यों और आदर्शों के चित्तौड़ को हर बार राघव चेतन और ख़िलजी छलते रहेंगे ?

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क्या वीरता, मूल्यों और आदर्शों के चित्तौड़ को हर बार राघव चेतन और ख़िलजी छलते रहेंगे…..?

जायसी और भंसाली दोनों का पद्मावत हमारे सामने है-प्रासंगिक है। चित्तौड़ और दिल्ली की तुलना में दोनों ही गाथाओं की संवेदना चित्तौड़ के ह्रदय के अधिक करीब है। जायसी ने केवल साहित्य रचा। मसनवी शैली में लिखा गया प्रेम और शौर्य की ही अभिव्यक्ति है।
शौर्य गाथा चित्तौड़ किले के द्वार पर राजा रत्न सेन और दिल्ली के शहंशाह ख़िलजी की लड़ाई ; दो सत्ताधारियों के बीच परस्पर युद्ध मे जब ख़िलजी मृत्यु के द्वार पर था तभी रत्न सेन की छल से हत्या करता है। वीर रत्न सेन ने ख़िलजी से कहा कि कम से कम तुम इस युद्ध में तो उसूलों का पालन करते ; पर ख़िलजी ने कहा सिर्फ जीत ही ध्येय है मेरा, मेरे लिए युद्ध में धोखा और फ़रेब सब जायज़ है । उस दिन रत्न सेन मरकर भी शौर्य गाथा का नायक बनता है। आज भी रत्न सेन को ही मरना पड़ता है।

पद्मावत का शौर्य मुख्यतः मेवाड़ के अदम्य वीर गोरा और बादल का है और शौर्य सिंहल कन्या मेवाड़ की रानी पद्मिनी का है।

दूसरी ओर ख़िलजी और राघव चेतन धोखा, अधर्म, अन्याय और क्रूरता के प्रतीक थे।

पद्मिनी का सौंदर्य सिंहल द्वीप की संवेदना थी, जो चित्तौड़ का आन बान और शान बनी और अन्ततः जो ख़िलजी की दिल्ली के लिए नश्वर प्रकृति में विलीन अपराजेय राख और मिट्टी बनकर रह गई।

रानी पद्मिनी का जौहर उस जमाने की सती प्रथा जैसा नहीं था। जिस चित्तौड़ के तीस हजार पुरुषों और बच्चों ने किले की रक्षा में अपना बलिदान दिया और उसी बलिदान को चर्मोत्कर्ष तक पहुंचाया पद्मिनी और महल की महिलाओं के जौहर ने। भारत का इतिहास उन महिलाओं के मान और सम्मान को आज भी नमन करता है। रानी पद्मिनी और उनकी वीरता आगे आने वाले वर्षों में भी विश्व चेतना को गौरव के साथ आंदोलित करेगी ।

पर, आज भी राघव चेतन घाव दे रहा है — ख़िलजी की प्रतिनैतिकता आज भी प्रासंगिक है– आगे आने वाले वर्षों में भी राघव चेतन, ख़िलजी जैसी प्रास्थितियां भारत की नींव पर प्रहार करती रहेंगी। ख़िलजी सा छल विद्यमान होगा। कल भी पद्मिनी, गोरा, बादल, रत्न सेन ने ही बलिदान दिया था— आज भी इनका ही अंत प्रासंगिक है —- आगे भी इनका अंत ही नियति रहेगी पर, इनके शौर्य और यश की गाथा गूंजती रहेगी। सत्य इनके साथ रहेगा।

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यह भारतीय दर्शन है… भारतीय वैचारिक उदात्तता .

दो अलग विचारधारा और अलग दर्शन में पले बढे राजनीतिज्ञ एक देश के लिए.. एक व्यवस्था के लिए कैसे एक दूसरे का सम्मान करते हुए काम करते हैं यह देखने, सीखने और समझने की बात है…

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का एक पत्र पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने शेयर किया है। श्री प्रणब मुखर्जी लिखते हैं “On my last day in office as the President, I received a letter from PM @narendramodi that touched my heart ! Sharing with you all.

आखिर ऐसा क्या है उस पत्र में … हमारे प्रधानमंत्री लिखते हैं Dear Pranab Da, .. इस आत्मीय संबोधन के बाद पत्र के पांचवें पारा में प्रधानमंत्री ने जो लिखा है वह सबको पढ़ना चाहिए और वह सबके लिए महत्व की बात है…
Pranab Da, our political journeys took shape in different political parties. Our ideologies, at times, have been different. Our experiences are also varied. My administrative experience was from my state whereas you have seen the expanse of our national and politics for decades. Yet, such is the strength of your intellect and wisdom that we are able to work with this synergy.
और अंत मे
Rashtrapati Ji, It has been an honour to work with you, as your Prime Minister!

यह भारतीय दर्शन है… भारतीय वैचारिक उदात्तता .