करम पर्व

बोकारो डायरी

22 सितम्बर 2026

हमारे गाँवों के अखरा में मांदर की थाप कभी मौन न हो।

आज करम एकादशी है। प्रकृति पर अधिकार नहीं, प्रकृति के साथ सहभागिता—यही करम का दर्शन है। झारखण्ड की धरती पर करम पर्व  यानी प्रकृति, मनुष्य और जिजीविषा का उत्सव 

अगर आप झारखण्ड की माटी को- माँदर की थाप को महसूस कर सकते हैं तो आप करम पर्व में निहित प्रकृति और जिजीविषा की व्यथा-कथा और इसके संदेश तक पहुँच सकते हैं। 

करम पर्व- आँगन में सजे जावा, अखरा में स्थापित करम की डाल, मांदर की थाप, एक-दूसरे का हाथ थामकर नृत्य करते लोग और अपने भाइयों की मंगलकामना करती बहनें। भव्य है यह आयोजन और इसके पीछे छिपा जीवन-दर्शन।

बोकारो में रहते हुए, यहाँ के गाँवों और लोगों के बीच जाते हुए, मुझे बार-बार अनुभव होता है कि हमारी लोकसंस्कृति में जीवन के वे उत्तर छिपे हैं, जिन्हें आधुनिक दुनिया आज बड़ी-बड़ी पुस्तकों और विमर्शों में खोज रही है। करम पर्व भी ऐसा ही एक उत्तर है। जरा सोचिये, कैसे करम की एक डाल हमारी सामूहिक आस्था का केंद्र बन जाती है। परिवार, कृषि और समाज की समृद्धि की कामना की जाती है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के संरक्षण का कितना सहज मार्ग चुना था।

आज हम पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन की चर्चा करते हैं। ये हमारे समय की अनिवार्य चिंताएँ हैं। लेकिन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का विचार हमारी लोकपरंपराओं में सदियों से जीवन्त है।

करम पर्व का दूसरा पक्ष है—मानवीय संबंध और हमारी जिजीविषा। हम दूर बैठे व्यक्ति से क्षणभर में जुड़ सकते हैं, पर, अपने पास बैठे व्यक्ति से संवाद नहीं कर पाते। ऐसे समय में करम का अखरा हमें कुछ याद दिलाता है। वहाँ लोग एक-दूसरे का हाथ थामते हैं। एक लय में आगे बढ़ते हैं। कोई अकेला नहीं होता। यह केवल नृत्य नहीं है। यह समाज को जीने का दर्शन देता है। जहाँ सबके कदम एक-दूसरे के साथ चलते हैं, वहाँ जीवन केवल व्यक्तिगत यात्रा नहीं रह जाता।

हमारी युवा पीढ़ी जिनके सामने तकनीक, विज्ञान और ज्ञान के नए क्षितिज हैं। उनसे कहना है कि आप आगे बढ़िए, दुनिया देखिए, नए सपने देखिए। लेकिन, कभी अपने गाँव के अखरा में भी बैठिए। मांदर की थाप सुनिए। अपने बुजुर्गों से करम की कथा पूछिए। जावा जगाने वाले गीतों के अर्थ समझिए। संभव है, वहाँ आपको जीवन का कोई ऐसा सत्य मिल जाए, जो किसी आधुनिक पुस्तक, इंटरनेट और एआई में न मिल सके।

हमारे सांस्कृतिक विरासत संग्रहालयों में नहीं ; हमारे जीवन में जीवित रहना चाहिए।

बोकारो की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। यहाँ आधुनिक उद्योग हैं, शिक्षा के बड़े संस्थान हैं, विकास की नई संभावनाएँ हैं। लेकिन इसी बोकारो में हमारे गाँव, जंगल, खेत, लोकगीत और जनजातीय परंपराएँ भी हैं। हम ऐसा बोकारो बनाएँ, जहाँ उद्योग भी आगे बढ़ें और जंगल भी सुरक्षित रहें; जहाँ हमारे गाँवों के अखरा में मांदर की थाप कभी मौन न हो।

समस्त बोकारोवासियों को करम एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

अजय नाथ झा

 #करम_पर्व 

#BokaroSeJohar

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ajaynathjha

साधक है समता के सत्य न्याय करूणा के ! हिन्द प्रेम सम्बल है, विश्व प्रेम साध्य बना ।।

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